आप अपना शरीर नहीं हैं। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है,क्योंकि बचपन से हमें यही सिखाया गया है— “मैं यह शरीर हूँ।”इसीलिए हम इसके लिए डरते हैं,बीमार पड़ने से घबराते हैं,बुढ़ापे से डरते हैं,और मौत का ख़याल आते ही काँप जाते हैं। लेकिन सोचिए—अगर यह मान्यता ही ग़लत हो तो? अगर यह शरीर […]
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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते
क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचारआपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर,कभी चिंता,कभी भविष्य की टेंशन,तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ किइस तूफ़ान के बीच भीएक ऐसी जगह हैजहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंगयही जगह दिखाता है। […]
सचेतन- 26 सबसे बड़ा झूठ जो आपका मन हर पल आपसे बोलता है
क्या हो अगरआपको बताया गया सबसे बड़ा झूठकिसी और ने नहीं…आपके अपने मन ने बताया हो? और वो भी—हर सेकंड।हर पल। वो आवाज़ जो कहती है—“मैं सोच रहा हूँ।”“मैं कर रहा हूँ।”“मैं देख रहा हूँ।” लेकिन एक पल रुककर सोचिए—अगर यह “मैं” ही असली न हो तो? अगर यह सिर्फ़ एक नक़ली पहचान हो—जो उस […]
सचेतन- 25 सबसे बड़ा झूठ जो आप रोज़ खुद से बोलते हैं
क्या आप जानते हैंकि आप हर दिन खुद से एक झूठ बोलते हैं? एक ऐसा झूठजो आपको समझदार, स्मार्टऔर कंट्रोल में महसूस कराता है— लेकिन असल मेंयही झूठआपके ज़्यादातर दुखों और संघर्षों की जड़ है। और वो झूठ है— “मैं जानता हूँ।” …. ये तीन छोटे शब्दबहुत मामूली लगते हैं, है न? लेकिन क्या आपने […]
सचेतन- 23: वह प्राचीन पहचान की भूल, जो आपके सारे दुःख की जड़ है
क्या कभी ऐसा लगता हैकि आपका मन ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष बन गया है? विचार रुकते नहीं…चिंताएँ पीछा नहीं छोड़तीं…और भीतर एक शोर लगातार चलता रहता है। हम शांति की तलाश मेंकभी रिश्ते बदलते हैं,कभी काम,कभी जगहें। पर भीतर का शोरकुछ देर शांत होकरफिर लौट आता है। तो प्रश्न यह है—गलत क्या है? क्या […]
सचेतन- 18: मैं राजा हूँ, मेरे भीतर सब चल रहा है
क्या आपने कभी उस बेचैनी, उस हल्की-सी घबराहट पर गौर किया है जो हर समय हमारे साथ चलती रहती है? वो एक एहसास कि कुछ तो गड़बड़ है—बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे अपने अंदर। यह एक खामोश तकलीफ है, सीने में एक तनाव जिसके साथ हम सुबह उठते हैं और बस… उसे पूरे […]
