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सचेतन- 33 –आत्मबोध – दुख, डर और अशांति आप नहीं हैं

क्या आपने कभी महसूस किया है किमन लगातार बेचैन रहता है? कभी चिंता,कभी डर,कभी किसी से लगाव,तो कभी किसी से चिढ़। और फिर हम कहते हैं—“मैं बहुत परेशान हूँ।” लेकिन ज़रा ठहरिए— अगर यह परेशानीआपकी नहीं,आपके मन की हो तो? आत्मबोध का श्लोक 33यही क्रांतिकारी बात कहता है— आप मन नहीं हैं, और इसलिए दुख, […]

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सचेतन- 32 – आप अपना शरीर नहीं हैं 

आप अपना शरीर नहीं हैं। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है,क्योंकि बचपन से हमें यही सिखाया गया है— “मैं यह शरीर हूँ।”इसीलिए हम इसके लिए डरते हैं,बीमार पड़ने से घबराते हैं,बुढ़ापे से डरते हैं,और मौत का ख़याल आते ही काँप जाते हैं। लेकिन सोचिए—अगर यह मान्यता ही ग़लत हो तो? अगर यह शरीर […]

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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते

क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचारआपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर,कभी चिंता,कभी भविष्य की टेंशन,तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ किइस तूफ़ान के बीच भीएक ऐसी जगह हैजहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंगयही जगह दिखाता है। […]

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सचेतन- 30 – अहंकार का जन्म

(Ātmabodha Verse 30: The Birth of the Ego) आपने अहंकार के बारे में बहुत कुछ सुना होगा।कभी कहा जाता है—“ईगो छोड़ो।”“अहंकार को मारो।”“ईगो सबसे बड़ी समस्या है।” लेकिन ज़रा एक पल रुककर सोचिए— अगर अहंकार से लड़ना हीअहंकार को और मज़बूत कर देता हो तो? अगर अहंकार कोई दुश्मन नहीं,बल्कि एक गलत पहचान हो? आत्मबोध […]

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सचेतन- 29 आपकी चेतना एक स्वयं-प्रकाशित सूर्य है

क्या आपने कभी रुककर यह सोचा है—कि आपकी आँखों से जो देख रहा है,वो कौन नहीं… बल्कि क्या है? हम पूरी ज़िंदगी यह मानकर चलते हैंकि हम एक शरीर के अंदर बैठे हुएएक छोटे से इंसान हैं—जो बाहर की दुनिया को देख रहे हैं। जैसे हम एक छोटी-सी मोमबत्ती हों,और दुनिया बहुत बड़ी और अँधेरी। […]

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सचेतन- 27 इस 5 मिनट की बात ने मेरी सालों पुरानी चिंता खत्म कर दी

मैं पूरी ज़िंदगी एक ही लाइन पर जी रहा था— “अगर कुछ ग़लत हो गया तो?” यह एक छोटा-सा सवाल था,लेकिन यही सवालहर मौके को डर में बदल देता था। मैं शरीर से तो सामने मौजूद रहता था,लेकिन मेरा मनहज़ारों ऐसे भविष्य में जी रहा होता थाजो अभी आए ही नहीं थे। लेकिन अगर मैं […]

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सचेतन- 26 सबसे बड़ा झूठ जो आपका मन हर पल आपसे बोलता है

क्या हो अगरआपको बताया गया सबसे बड़ा झूठकिसी और ने नहीं…आपके अपने मन ने बताया हो? और वो भी—हर सेकंड।हर पल। वो आवाज़ जो कहती है—“मैं सोच रहा हूँ।”“मैं कर रहा हूँ।”“मैं देख रहा हूँ।” लेकिन एक पल रुककर सोचिए—अगर यह “मैं” ही असली न हो तो? अगर यह सिर्फ़ एक नक़ली पहचान हो—जो उस […]

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सचेतन- 25 सबसे बड़ा झूठ जो आप रोज़ खुद से बोलते हैं

क्या आप जानते हैंकि आप हर दिन खुद से एक झूठ बोलते हैं? एक ऐसा झूठजो आपको समझदार, स्मार्टऔर कंट्रोल में महसूस कराता है— लेकिन असल मेंयही झूठआपके ज़्यादातर दुखों और संघर्षों की जड़ है। और वो झूठ है— “मैं जानता हूँ।” …. ये तीन छोटे शब्दबहुत मामूली लगते हैं, है न? लेकिन क्या आपने […]

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सचेतन- 23: वह प्राचीन पहचान की भूल, जो आपके सारे दुःख की जड़ है

क्या कभी ऐसा लगता हैकि आपका मन ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष बन गया है? विचार रुकते नहीं…चिंताएँ पीछा नहीं छोड़तीं…और भीतर एक शोर लगातार चलता रहता है। हम शांति की तलाश मेंकभी रिश्ते बदलते हैं,कभी काम,कभी जगहें। पर भीतर का शोरकुछ देर शांत होकरफिर लौट आता है। तो प्रश्न यह है—गलत क्या है? क्या […]

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सचेतन- 17:  आत्मा हर जगह है, फिर भी हमें दिखती क्यों नहीं?

नमस्कार मित्रों,आज सचेतन में एक बहुत ही सरल,पर बहुत गहरी बात पर बातचीत करेंगे। एक सवाल से शुरू करते हैं— क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है किसब कुछ होते हुए भीकुछ अधूरा-सा है? लोग हैं, काम है,हँसी भी है…फिर भी भीतर कहींएक दूरी-सी,एक खालीपन-सा। हम सोचते हैं—शायद कुछ मिल जाए,तो यह भर जाएगा।कोई रिश्ता,कोई […]