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सचेतन — 49 “मन को धोइए — मुक्ति हथेली के आँवले जैसी”

नमस्कार। मनोमय कोश की यात्रा आज पूरी होती है। अब तक आपने देखा — मन में “मैं-मेरा” बनता है। मन ही संसार रचता है। मन ही बाँधता है, मन ही छुड़ाता है। आज दो बातें बाकी हैं — मन को धोएँ कैसे? और आखिरी सवाल — क्या यह मन “मैं” हूँ? पहले देखिए — मन […]