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सचेतन — 48 “जो बाँधता है, वही छुड़ाता है — मन के दो चेहरे”

नमस्कार। पिछली बार आपने देखा — संसार मन की रचना है। तो एक डर पैदा हो सकता है — “अगर मन ही सब गड़बड़ की जड़ है… तो क्या मन दुश्मन है?” आज शास्त्र इसका बहुत सुंदर जवाब देता है। शास्त्र कहता है — नहीं। मन दुश्मन नहीं। मन दोनों है। जो बाँधता है — […]

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सचेतन- 45 वेदांत सूत्र: विरह → विरक्ति → वैराग्य → संन्यास

वेदान्त की चार सीढ़ियाँनमस्कार दोस्तों,आप सुन रहे हैं सचेतन —जहाँ हम जीवन, मन और आत्मा के अनुभवों कोसरल भाषा में समझते हैं। आज का विषय है—विरह, विरक्ति, वैराग्य और संन्यास वेदान्त में ये चारों एक गहरी, आंतरिक यात्रा के चरण हैं।बाहरी दुनिया से भीतर की ओर लौटने की यात्रा। विरह — दूरी का दर्द  विरह […]

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सचेतन- 44 वेदांत सूत्र: वैराग्य: त्याग नहीं, अनासक्ति

नमस्कार दोस्तों,आप सुन रहे हैं सचेतन —जहाँ हम जीवन और आत्मा के गहरे सच कोसरल और सहज भाषा में समझते हैं। आज हम बात करेंगे—वैराग्य की। लेकिन वह वैराग्य नहीं जिसे त्याग समझ लिया जाता है…बल्कि वास्तविक वैराग्य, जो मन की आज़ादी है। वैराग्य क्या है? हम अक्सर सोचते हैं कि वैराग्य मतलब— सब छोड़ […]

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सचेतन:बुद्धचरितम्-5 “संवेगोत्पत्तिः

संवेगोत्पत्तिः (मोहभंग) (The Genesis of Disenchantment): बुद्ध के मन में वैराग्य की उत्पत्ति का वर्णन है, जब उन्होंने वृद्धावस्था, रोग और मृत्यु का सामना किया।”मोहभंग” का अर्थ है भ्रांति का दूर होना, अज्ञान का नाश होना या निराशा की भावना। यह तब होता है जब किसी की उम्मीदें पूरी नहीं होती हैं या जब कोई […]