पुरुष के त्याग (बलिदान) से ही सूर्य, चन्द्रमा, इन्द्र, अग्नि, वायु और दिशाएँ उत्पन्न हुईं। ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद भी उसी पुरुष से प्रकट हुए।अर्थात: हर कोश को ऐसे समझो, जैसे वह एक जीवित व्यक्ति हो, जिसके अंग-प्रत्यंग हों। 🌱 तैत्तिरीयोपनिषद् में प्रयोग मान लीजिए कोई बच्चा पूछे — “बुद्धि क्या होती है?”यदि हम […]
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सचेतन- 20:तैत्तिरीय उपनिषद्: पुरुष-रूपक
पुरुष-रूपक का अर्थ: जब किसी अमूर्त या दार्शनिक सत्य (जैसे अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश) को समझाना कठिन हो, तो उपनिषद् उसे “पुरुष” (मनुष्य-आकृति) के रूप में दिखाते हैं। “कोश” (Sanskrit: कोश) का अर्थ है — आवरण या परत।उपनिषदों में कहा गया है कि आत्मा (पुरुष / ब्रह्म) सीधे दिखाई […]
