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सचेतन- 08:  आत्मबोध की यात्रा – “जगत बुदबुदों जैसा है”

“कभी आपने पानी में उठते बुदबुदे देखे हैं?वे अचानक पैदा होते हैं…कुछ देर टिकते हैं…और फिर बिना कोई निशान छोड़ेखुद ही विलीन हो जाते हैं। शंकराचार्य कहते हैं—हमारा जीवन और यह पूरा जगत भी कुछ ऐसा ही है।” उपादानेऽखिलाधारे जगन्ति परमेश्वरे। सर्गस्थितिलयान्यान्ति बुद्बुदानीव वारिणि॥८॥ सरल अर्थ “यह सम्पूर्ण जगतउस परमेश्वर में उत्पन्न होता है,उसी में […]

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सचेतन- 07:  आत्मबोध की यात्रा -“जब तक ब्रह्म नहीं जाना— जगत सत्य लगता है”

“कभी आपने दूर से चमकती हुई कोई चीज़ देखी है…और लगा हो— यह तो चाँदी है? आप पास गए…और पता चला— वह तो सीप थी।चाँदी नहीं। शंकराचार्य कहते हैं—जगत का ‘सत्य’ भी कुछ ऐसा ही है।” तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्तिकारजतं यथा। यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम्॥७॥ “यह जगत तब तक सत्य जैसा प्रतीत होता है,जब तक ब्रह्म— […]