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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते

क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचारआपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर,कभी चिंता,कभी भविष्य की टेंशन,तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ किइस तूफ़ान के बीच भीएक ऐसी जगह हैजहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंगयही जगह दिखाता है। […]

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सचेतन- 26 सबसे बड़ा झूठ जो आपका मन हर पल आपसे बोलता है

क्या हो अगरआपको बताया गया सबसे बड़ा झूठकिसी और ने नहीं…आपके अपने मन ने बताया हो? और वो भी—हर सेकंड।हर पल। वो आवाज़ जो कहती है—“मैं सोच रहा हूँ।”“मैं कर रहा हूँ।”“मैं देख रहा हूँ।” लेकिन एक पल रुककर सोचिए—अगर यह “मैं” ही असली न हो तो? अगर यह सिर्फ़ एक नक़ली पहचान हो—जो उस […]

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सचेतन- 25 सबसे बड़ा झूठ जो आप रोज़ खुद से बोलते हैं

क्या आप जानते हैंकि आप हर दिन खुद से एक झूठ बोलते हैं? एक ऐसा झूठजो आपको समझदार, स्मार्टऔर कंट्रोल में महसूस कराता है— लेकिन असल मेंयही झूठआपके ज़्यादातर दुखों और संघर्षों की जड़ है। और वो झूठ है— “मैं जानता हूँ।” …. ये तीन छोटे शब्दबहुत मामूली लगते हैं, है न? लेकिन क्या आपने […]

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सचेतन- 23: वह प्राचीन पहचान की भूल, जो आपके सारे दुःख की जड़ है

क्या कभी ऐसा लगता हैकि आपका मन ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष बन गया है? विचार रुकते नहीं…चिंताएँ पीछा नहीं छोड़तीं…और भीतर एक शोर लगातार चलता रहता है। हम शांति की तलाश मेंकभी रिश्ते बदलते हैं,कभी काम,कभी जगहें। पर भीतर का शोरकुछ देर शांत होकरफिर लौट आता है। तो प्रश्न यह है—गलत क्या है? क्या […]

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सचेतन- 38 वेदांत सूत्र: जीवन से सम्बन्ध

स्वागत है “जीवन के सूत्र” में।आज हम बात करेंगे उस सबसे सुंदर शब्द की —“सम्बन्ध”। वेदांत कहता है — “ब्रह्म ही सबका कारण और आधार है।”इसका मतलब है कि हम सब एक ही चेतना से जुड़े हैं —एक अदृश्य सूत्र से, जिसे हम “सम्बन्ध” कहते हैं। एक छोटी सी कहानी है — एक गाँव में […]

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सचेतन- 02: मनुष्य जन्म: चेतना की उच्चतम अवस्था

सचेतन का कार्यक्रम धार्मिक शिक्षा नहीं, बल्कि जीवन का दिशा–सूचक तारा है।यह हमें आलस्य, भ्रम और अज्ञान से मुक्त करके ज्ञान, कर्म और आत्मोन्नति की ओर ले जाता है। मनुष्य जन्म का आध्यात्मिक अर्थ क्या है? मनुष्य जन्म कोई सामान्य बात नहीं है। यह परमात्मा का दिया हुआ एक विशेष अवसर है — स्वयं को […]

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सचेतन- 13: प्रज्ञा से चेतना का विकास

🧠 प्रज्ञा से चेतना का विकास: चेतना का अर्थ है – जागरूकता।प्रज्ञा का अर्थ है – आत्मिक अनुभव से उत्पन्न गहरी बुद्धि। “आत्मिक अनुभव से उत्पन्न गहरी बुद्धि” का अर्थ है — ऐसा ज्ञान या समझ जो केवल पढ़ाई, तर्क या सोच से नहीं आता, बल्कि स्वयं के भीतर गहराई से अनुभव करके आता है। […]

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सचेतन- 8: मानव चेतना के विभिन्न स्तर

‘मनस्’, ‘विज्ञान’, और ‘प्रज्ञा’ — ये तीनों शब्द भारतीय दर्शन और उपनिषदों में मानव चेतना के विभिन्न स्तरों को दर्शाते हैं। आइए इन्हें सरल और स्पष्ट भाषा में समझें: 🧠 1. मनस् (Manas) – मन या मनोवृत्ति ‘मनस्’ वह मानसिक शक्ति है जो इंद्रियों से जानकारी ग्रहण करती है, उसे जोड़ती है, और विचारों को […]

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सचेतन- 7: आत्मा – चेतना का आधार

🕉️ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म को जानना: 🌟 ब्रह्म को जानने का परिणाम: 📖 एक सरल उदाहरण: जैसे समुद्र की लहरें समुद्र से अलग नहीं होतीं, वैसे ही आत्मा ब्रह्म से अलग नहीं है।ब्रह्म को जानना = यह जानना कि मैं लहर नहीं, मैं स्वयं समुद्र हूँ। 1. अहं ब्रह्मास्मि (Aham Brahmasmi) – मैं ब्रह्म […]

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सचेतन- 6: निदिध्यासन – आत्मा का साक्षात्कार

स्वामी विवेकानंद कहते थे — “जब विचारों का शुद्धिकरण हो जाता है, तब मन सत्य में स्थित होता है। तब ज्ञाता और ज्ञेय के बीच भेद मिट जाता है। यही है निदिध्यासन — आत्मा के स्वरूप में स्थित हो जाना।” निष्कर्ष निदिध्यासन आत्म-चिंतन की वह पराकाष्ठा है, जहाँ ‘जानना’ और ‘हो जाना’ एक हो जाता […]