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सचेतन- 26:तैत्तिरीय उपनिषद् आनन्द की सीढ़ियाँ (आनन्दमिमांसा)

‘मीमांसा’ शब्द का अर्थ है गंभीर मनन, विचार-विमर्श, या किसी विषय के मूल तत्त्वों का गहन ज्ञान प्राप्त करने के लिए किया जाने वाला विवेचन। मीमांसा दर्शन का मुख्य उद्देश्य धर्म के सार को समझना और मानव कर्तव्य को स्पष्ट करना है। 1. मानव-सुख (Manuṣyānanda) कल्पना करो कि एक 25 वर्ष का युवा है — […]

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सचेतन- 11:सत् चित् आनन्द और सत्यम शिवम् सुंदरम् का जीवंत उदाहरण

सत् (सत्य या अस्तित्व का अनुभव) यथार्थ को जानना, सच्चाई में जीना, और सही कर्म करना। उदाहरण: चित् (ज्ञान और विवेक की जागरूकता) चेतना, आत्मबोध, और भीतर की समझ। उदाहरण: आनन्द (परम सुख, जो आत्मा से जुड़कर आता है) नित्य, शाश्वत, भीतर से उपजा हुआ सुख। उदाहरण: सत्यम शिवम् सुंदरम् (सत्य ही शिव है, और […]

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सचेतन 10 सत् चित् आनन्द रूपाय, शिवाय नमः, सुंदराय नमः

जीवन एक प्रयोगशाला है, और चेतना उस प्रयोग का केंद्र है” जहाँ मन, बुद्धि, हृदय और आत्मा मिलकर एक सतत प्रयोग करते हैं — सत्, चित् और आनन्द की खोज का प्रयोग। 🧪 जीवन = प्रयोगशाला यह संसार एक प्रयोगशाला के समान है — जहाँ हर अनुभव, हर चुनौती, हर संबंधएक परीक्षण है आत्मा की […]

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सचेतन- 07: आनन्द — आत्मानुभूति से उत्पन्न सुख

सत्-चित्-आनन्द: मनुष्यत्व की तीन सीढ़ियाँ 1️⃣ सत् (सत्य / अस्तित्व): सच्चाई को जानना और उसे जीना। यह हमें यथार्थ का बोध कराता है — सही निर्णय और शुद्ध कर्म की दिशा देता है। 2️⃣ चित् (चेतना / विवेक): जागरूकता और आत्मबोध का विकास। यह हमें दूसरों से अलग बनाता है — हम सोच सकते हैं, […]