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सचेतन- 30: तैत्तिरीय उपनिषद् – “तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व — तपो ब्रह्मेति”

अर्थ — “तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा करो — तप ही ब्रह्म है।” तप का यहाँ अर्थ है — आत्म-संयम (Self-control), सत्यनिष्ठा (Truthfulness), शुद्ध आचरण (Pure conduct), निरंतर साधना (Continuous spiritual discipline) ये आत्म-विकास और आध्यात्मिक प्रगति के चार स्तंभ माने जाते हैं: इन चारों का समन्वय ही “सच्चे जीवन का धर्म” […]

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सचेतन- 15:तैत्तिरीय उपनिषद्: ब्रह्मानंदवल्ली-तप, सत्य, और आत्म-संयम

ब्रह्मानंदवल्ली — उस साधक को ब्रह्मानंद (ब्रह्म का आनंद) की अनुभूति तक ले जाती है। तैत्तिरीयोपनिषद् ब्रह्म को केवल जानने की बात नहीं करता, बल्कि ब्रह्म “होने” की बात करता है। और इसका माध्यम है — तप, सत्य, और आत्म-संयम। तैत्तिरीयोपनिषद् में ब्रह्म केवल एक ज्ञान का विषय नहीं है कि हम उसे “जान” लें, […]