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सचेतन — 45 “प्राणमय कोश — साँस भी ‘मैं’ नहीं”

नमस्कार। पिछली कड़ी में हमने पहली परत हटाई। अन्नमय कोश — यानी यह शरीर। हमने समझा — शरीर देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं। लेकिन अब कोई कहेगा — “ठीक है, मैं शरीर नहीं। लेकिन शरीर में जो जान है, जो साँस चल रही है — वह तो मैं हूँ न?” बहुत अच्छा […]

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सचेतन — 44 “‘मैं शरीर हूँ’ — यह सोच छोड़िए, मुक्ति पाइए”

नमस्कार। आज हम एक यात्रा के पड़ाव पर पहुँचे हैं। पिछली कड़ियों में आपने सीखा — शरीर क्या है। “मैं शरीर हूँ” — इस सोच से दुख कैसे आता है। और तीन तरह के लोग कौन हैं। अब आखिरी कदम। और यह कदम बहुत सरल है। बस एक काम — “मैं शरीर हूँ” वाली सोच […]

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सचेतन — 43 “तीन तरह के लोग — तीन तरह की पहचान”

नमस्कार। पिछली बार आपने विचार में बात किया की — शरीर देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं। लेकिन आज एक रोचक बात। सब लोग अपने आप को एक जैसा नहीं मानते। कोई कुछ मानता है, कोई कुछ। विवेकचूड़ामणि कहती है — दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं। तीन तरह की पहचान। […]

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सचेतन — 42 “शरीर — देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं”

नमस्कार। पिछली बार आपने विचार सुना की  — “मैं अगर शरीर हूँ” — तो यही सोच सारे दुख की जड़ है। आज एक कदम और गहरे चलते हैं। आज हम यह देखेंगे — शरीर आखिर है क्या? और यह भी — आप शरीर क्यों नहीं हो सकते? आज कोई कहानी-किस्सा नहीं, सीधी-सीधी समझ की बात। […]

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सचेतन — 41 “पाँच परतें — जो आपको आपसे छिपाए हुए हैं”

नमस्कार। पिछली बार आपने सीखा — विवेक की तलवार क्या है। आज उस तलवार को चलाने का समय है। लेकिन चलानी कहाँ है? उन पाँच परतों पर, जो आपकी चेतना को ढके हुए हैं। शास्त्र इन्हें कहते हैं — पंचकोश। यानी पाँच परतें। पाँच पर्दे। आज हम एक-एक पर्दा हटाएँगे। और देखेंगे कि पीछे कौन […]

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सचेतन — 40 “विवेक की तलवार — जो कभी टूटती नहीं”

नमस्कार। आपने अब तक बहुत कुछ सीखा है। बंधन कैसे बनता है? अहंकार कैसे काम करता है। संसार का पेड़ कैसे बढ़ता है। लेकिन आज सबसे ज़रूरी बात। अगर यह सारा बंधन काटना हो… तो कैसे काटें? कौन सी चीज़ है जो सारे बंधन को एक पल में काट देती है? उसका नाम है — […]

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सचेतन- 10: “ऋतम् वद” — सत्य और नियम में जियो, वही परम जीवन है।

ऋत के माध्यम से अमृत (ज्ञान, आत्मा, स्वर्ग) की अनुभूति होती है। “ऋतम् वद” का अर्थ है — सत्य बोलो, सत्य जियो, और जीवन को नियम व नैतिकता के मार्ग पर चलाओ।यह केवल सच बोलने की बात नहीं, बल्कि अपने विचार, वाणी और कर्म में सत्य, न्याय, और ब्रह्मांडीय व्यवस्था को अपनाने की शिक्षा है। […]

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सचेतन- 09: यह चेतन एक प्रयोगशाला है: जीवन का अंतर्यात्रा स्थल

हमारा मन, शरीर और आत्मा — ये मिलकर चेतन प्रयोगशाला की तरह हैं। 🧘‍♀️ क्यों है यह चेतन प्रयोगशाला विशेष? क्योंकि… “जीवन एक प्रयोगशाला है, और चेतना उस प्रयोग का केंद्र है। सत्, चित् और आनन्द — इसी प्रयोग का अंतिम फल है।” मन: चेतन प्रयोगशाला का प्रयोगकर्ता जहाँ मन प्रयोग करता है — अपने […]

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सचेतन- 7: आत्मा – चेतना का आधार

🕉️ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म को जानना: 🌟 ब्रह्म को जानने का परिणाम: 📖 एक सरल उदाहरण: जैसे समुद्र की लहरें समुद्र से अलग नहीं होतीं, वैसे ही आत्मा ब्रह्म से अलग नहीं है।ब्रह्म को जानना = यह जानना कि मैं लहर नहीं, मैं स्वयं समुद्र हूँ। 1. अहं ब्रह्मास्मि (Aham Brahmasmi) – मैं ब्रह्म […]

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सचेतन- 6: निदिध्यासन – आत्मा का साक्षात्कार

स्वामी विवेकानंद कहते थे — “जब विचारों का शुद्धिकरण हो जाता है, तब मन सत्य में स्थित होता है। तब ज्ञाता और ज्ञेय के बीच भेद मिट जाता है। यही है निदिध्यासन — आत्मा के स्वरूप में स्थित हो जाना।” निष्कर्ष निदिध्यासन आत्म-चिंतन की वह पराकाष्ठा है, जहाँ ‘जानना’ और ‘हो जाना’ एक हो जाता […]