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सचेतन- 25 सबसे बड़ा झूठ जो आप रोज़ खुद से बोलते हैं

क्या आप जानते हैंकि आप हर दिन खुद से एक झूठ बोलते हैं? एक ऐसा झूठजो आपको समझदार, स्मार्टऔर कंट्रोल में महसूस कराता है— लेकिन असल मेंयही झूठआपके ज़्यादातर दुखों और संघर्षों की जड़ है। और वो झूठ है— “मैं जानता हूँ।” …. ये तीन छोटे शब्दबहुत मामूली लगते हैं, है न? लेकिन क्या आपने […]

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सचेतन- 23: वह प्राचीन पहचान की भूल, जो आपके सारे दुःख की जड़ है

क्या कभी ऐसा लगता हैकि आपका मन ही आपका सबसे बड़ा संघर्ष बन गया है? विचार रुकते नहीं…चिंताएँ पीछा नहीं छोड़तीं…और भीतर एक शोर लगातार चलता रहता है। हम शांति की तलाश मेंकभी रिश्ते बदलते हैं,कभी काम,कभी जगहें। पर भीतर का शोरकुछ देर शांत होकरफिर लौट आता है। तो प्रश्न यह है—गलत क्या है? क्या […]

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सचेतन- 18:   मैं राजा हूँ, मेरे भीतर सब चल रहा है

क्या आपने कभी उस बेचैनी, उस हल्की-सी घबराहट पर गौर किया है जो हर समय हमारे साथ चलती रहती है? वो एक एहसास कि कुछ तो गड़बड़ है—बाहर की दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे अपने अंदर। यह एक खामोश तकलीफ है, सीने में एक तनाव जिसके साथ हम सुबह उठते हैं और बस… उसे पूरे […]

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सचेतन- 17:  आत्मा हर जगह है, फिर भी हमें दिखती क्यों नहीं?

नमस्कार मित्रों,आज सचेतन में एक बहुत ही सरल,पर बहुत गहरी बात पर बातचीत करेंगे। एक सवाल से शुरू करते हैं— क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है किसब कुछ होते हुए भीकुछ अधूरा-सा है? लोग हैं, काम है,हँसी भी है…फिर भी भीतर कहींएक दूरी-सी,एक खालीपन-सा। हम सोचते हैं—शायद कुछ मिल जाए,तो यह भर जाएगा।कोई रिश्ता,कोई […]

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सचेतन- 16:  आत्मबोध की यात्रा -आप सिर्फ एक छिलका हैं असली चावल तो अंदर है

आप सोचते हैं कि आप अपने विचारों को कंट्रोल करते हैं, है ना? लेकिन क्या हो, अगर मैं कहूँ कि आपके विचार, आपकी भावनाएँ, और यहाँ तक कि आपका ये शरीर… आप हैं ही नहीं? सुनने में थोड़ा अजीब लगेगा, पर क्या हो अगर वो, जिसे आप ‘मैं’ समझते हैं, वो असल में आप हो […]

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सचेतन- 04:  आत्मबोध की यात्रा – “मैं सीमित नहीं हूँ— यह सिर्फ़ भ्रम है”

“क्या आपको कभी ऐसा लगता है…कि मैं कमज़ोर हूँ, मैं अकेला हूँ, मैं अधूरा हूँ? जैसे जीवन में कुछ ‘कम’ पड़ रहा हो…जैसे मैं ‘सीमित’ हूँ… शंकराचार्य कहते हैं—यह सच नहीं है।यह सिर्फ़ अज्ञान का पर्दा है।” अवच्छिन्न इवाज्ञानात्तन्नाशे सति केवलः। स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापायेंऽशुमानिव॥४॥ सरल अर्थ “अज्ञान के कारण आत्मा सीमित-सी लगती है।जब अज्ञान […]

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सचेतन- 01:  आत्मबोध की यात्रा -स्वयं को जानने की शुरुआत

आत्मबोध — स्वयं को जानने की शुरुआत “क्या आपने कभी अपने आप से पूछा है—मैं कौन हूँ? नाम… पद… पहचान…ये सब तो बाहर के शब्द हैं। लेकिन जो भीतर महसूस करता है—वह कौन है?” भीतर की पुकार  “हर इंसान के जीवन मेंएक ऐसा क्षण आता हैजब वह रुकता है। सब कुछ होते हुए भीकुछ अधूरा […]

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सचेतन- 12: प्रज्ञा (Prajña) – आत्मबोध या गूढ़ बुद्धि

प्रज्ञा का अर्थ है – वह गहरी बुद्धि जो केवल सोचने या समझने तक सीमित नहीं है, बल्कि आत्मिक अनुभव से उत्पन्न होती है।यह वह स्थिति है जहाँ सत्य का प्रत्यक्ष बोध होता है — न केवल “जानना”, बल्कि “हो जाना”। 🧠 प्रज्ञा की विशेषताएँ: 📜 वेदांत में प्रज्ञा, उपनिषदों में कहा गया है:  “प्राज्ञः […]