“हम जीवन भर कुछ न कुछ करते रहते हैं…काम, पूजा, जप, ध्यान, सेवा… लेकिन एक सवाल है—क्या केवल करने से अज्ञान मिट जाता है? शंकराचार्य इस श्लोक मेंइसका बहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्। विद्याविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसंघवत्॥ सरल अर्थ “कर्म—यानी कोई भी क्रिया,अज्ञान को नहीं मिटा सकती,क्योंकि कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं […]
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सचेतन- 02: आत्मबोध की यात्रा – “ज्ञान ही मोक्ष का सीधा साधन है”
“हम जीवन भर बहुत कुछ करते रहते हैं…पूजा, जाप, यात्रा, योग, ध्यान… लेकिन एक सवाल चुपचाप खड़ा रहता है—क्या इससे सचमुच मुक्ति मिलती है? शंकराचार्य इस श्लोक मेंबहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मोक्षैकसाधनम्। पाकस्य वह्निवज्ज्ञानं विना मोक्षो न सिध्यति॥ “जैसे भोजन पकाने के लिएसीधे तौर पर आग ही चाहिए—वैसे ही मोक्ष के लिए […]
सचेतन- 01: आत्मबोध की यात्रा -स्वयं को जानने की शुरुआत
आत्मबोध — स्वयं को जानने की शुरुआत “क्या आपने कभी अपने आप से पूछा है—मैं कौन हूँ? नाम… पद… पहचान…ये सब तो बाहर के शब्द हैं। लेकिन जो भीतर महसूस करता है—वह कौन है?” भीतर की पुकार “हर इंसान के जीवन मेंएक ऐसा क्षण आता हैजब वह रुकता है। सब कुछ होते हुए भीकुछ अधूरा […]
