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सचेतन — 49 “मन को धोइए — मुक्ति हथेली के आँवले जैसी”

नमस्कार। मनोमय कोश की यात्रा आज पूरी होती है। अब तक आपने देखा — मन में “मैं-मेरा” बनता है। मन ही संसार रचता है। मन ही बाँधता है, मन ही छुड़ाता है। आज दो बातें बाकी हैं — मन को धोएँ कैसे? और आखिरी सवाल — क्या यह मन “मैं” हूँ? पहले देखिए — मन […]

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सचेतन — 48 “जो बाँधता है, वही छुड़ाता है — मन के दो चेहरे”

नमस्कार। पिछली बार आपने देखा — संसार मन की रचना है। तो एक डर पैदा हो सकता है — “अगर मन ही सब गड़बड़ की जड़ है… तो क्या मन दुश्मन है?” आज शास्त्र इसका बहुत सुंदर जवाब देता है। शास्त्र कहता है — नहीं। मन दुश्मन नहीं। मन दोनों है। जो बाँधता है — […]

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सचेतन — 47 “सपना, जागना, गहरी नींद — मन का जादू”

नमस्कार। पिछली बार आपने देखा — मन की आग, जिसमें चैन जलता है। आज उससे भी गहरी बात। आज शास्त्र एक ऐसी बात कहेगा, जो सुनकर आप एक पल ठिठक जाएँगे। शास्त्र कहता है — यह पूरा संसार… मन का बनाया हुआ खेल है। कैसे? चलिए, तीन दरवाज़ों से देखते हैं। सपना। जागना। और गहरी […]

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सचेतन — 46 “मनोमय कोश — ‘मैं-मेरा’ की फैक्ट्री… नहीं, ‘मैं-मेरा’ का कारखाना”

नमस्कार। दो परतें हट चुकी हैं। शरीर — दिखता है, इसलिए मैं नहीं। साँस — कुछ जानती नहीं, इसलिए वह भी मैं नहीं। आज तीसरी परत। और यह परत सबसे ताक़तवर है। सबसे चालाक। इसका नाम है — मनोमय कोश। यानी मन की परत। आपके विचार। आपकी भावनाएँ। आपके सुख-दुख। आज इसी से मुलाक़ात। मनोमय […]

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सचेतन — 45 “प्राणमय कोश — साँस भी ‘मैं’ नहीं”

नमस्कार। पिछली कड़ी में हमने पहली परत हटाई। अन्नमय कोश — यानी यह शरीर। हमने समझा — शरीर देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं। लेकिन अब कोई कहेगा — “ठीक है, मैं शरीर नहीं। लेकिन शरीर में जो जान है, जो साँस चल रही है — वह तो मैं हूँ न?” बहुत अच्छा […]

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सचेतन — 44 “‘मैं शरीर हूँ’ — यह सोच छोड़िए, मुक्ति पाइए”

नमस्कार। आज हम एक यात्रा के पड़ाव पर पहुँचे हैं। पिछली कड़ियों में आपने सीखा — शरीर क्या है। “मैं शरीर हूँ” — इस सोच से दुख कैसे आता है। और तीन तरह के लोग कौन हैं। अब आखिरी कदम। और यह कदम बहुत सरल है। बस एक काम — “मैं शरीर हूँ” वाली सोच […]

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सचेतन — 43 “तीन तरह के लोग — तीन तरह की पहचान”

नमस्कार। पिछली बार आपने विचार में बात किया की — शरीर देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं। लेकिन आज एक रोचक बात। सब लोग अपने आप को एक जैसा नहीं मानते। कोई कुछ मानता है, कोई कुछ। विवेकचूड़ामणि कहती है — दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं। तीन तरह की पहचान। […]

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सचेतन — 42 “शरीर — देखी जाने वाली चीज़ है, देखने वाला नहीं”

नमस्कार। पिछली बार आपने विचार सुना की  — “मैं अगर शरीर हूँ” — तो यही सोच सारे दुख की जड़ है। आज एक कदम और गहरे चलते हैं। आज हम यह देखेंगे — शरीर आखिर है क्या? और यह भी — आप शरीर क्यों नहीं हो सकते? आज कोई कहानी-किस्सा नहीं, सीधी-सीधी समझ की बात। […]

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सचेतन — 41 “पाँच परतें — जो आपको आपसे छिपाए हुए हैं”

नमस्कार। पिछली बार आपने सीखा — विवेक की तलवार क्या है। आज उस तलवार को चलाने का समय है। लेकिन चलानी कहाँ है? उन पाँच परतों पर, जो आपकी चेतना को ढके हुए हैं। शास्त्र इन्हें कहते हैं — पंचकोश। यानी पाँच परतें। पाँच पर्दे। आज हम एक-एक पर्दा हटाएँगे। और देखेंगे कि पीछे कौन […]

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सचेतन — 40 “विवेक की तलवार — जो कभी टूटती नहीं”

नमस्कार। आपने अब तक बहुत कुछ सीखा है। बंधन कैसे बनता है? अहंकार कैसे काम करता है। संसार का पेड़ कैसे बढ़ता है। लेकिन आज सबसे ज़रूरी बात। अगर यह सारा बंधन काटना हो… तो कैसे काटें? कौन सी चीज़ है जो सारे बंधन को एक पल में काट देती है? उसका नाम है — […]