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सचेतन- 33 –आत्मबोध – दुख, डर और अशांति आप नहीं हैं

क्या आपने कभी महसूस किया है किमन लगातार बेचैन रहता है? कभी चिंता,कभी डर,कभी किसी से लगाव,तो कभी किसी से चिढ़। और फिर हम कहते हैं—“मैं बहुत परेशान हूँ।” लेकिन ज़रा ठहरिए— अगर यह परेशानीआपकी नहीं,आपके मन की हो तो? आत्मबोध का श्लोक 33यही क्रांतिकारी बात कहता है— आप मन नहीं हैं, और इसलिए दुख, […]

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सचेतन- 32 – आप अपना शरीर नहीं हैं 

आप अपना शरीर नहीं हैं। यह बात सुनने में अजीब लग सकती है,क्योंकि बचपन से हमें यही सिखाया गया है— “मैं यह शरीर हूँ।”इसीलिए हम इसके लिए डरते हैं,बीमार पड़ने से घबराते हैं,बुढ़ापे से डरते हैं,और मौत का ख़याल आते ही काँप जाते हैं। लेकिन सोचिए—अगर यह मान्यता ही ग़लत हो तो? अगर यह शरीर […]