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सचेतन- 35 –आत्मबोध – “मैं आकाश के समान हूँ”

क्या आपने कभी ध्यान दिया है— आपके जीवन मेंलोग आते हैं, जाते हैं…परिस्थितियाँ बदलती हैं…सुख-दुःख आते-जाते रहते हैं… लेकिन फिर भीआपके भीतर कहींकुछ ऐसा हैजो इन सबके बीचबिलकुल शांत बना रहता है? आत्मबोध के आज के विचार में हम बात करेंगे कीयही मौन सत्य की ओर इशारा करता है— “मैं आकाश के समान हूँ।” शंकराचार्य […]

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सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात

सचेतन- 34 –आत्मबोध – ध्यान नहीं, पहचान की बात क्या आपने कभी सोचा है—इतना ध्यान करने के बाद भीमन क्यों शांत नहीं होता? क्यों भीतर कहीं यह भावना बनी रहती है—“अभी कुछ और करना बाकी है…अभी मुक्ति दूर है…” आत्मबोध का आज का विचारयहीं एक बहुत गहरी बात कहता है— मुक्ति पाने की ज़रूरत नहीं […]

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सचेतन- 31 – जो टूटने वाला है, वह आप नहीं हो सकते

क्या आपको कभी ऐसा लगता है कि आपके अपने ही विचारआपको इधर-उधर पटकते रहते हैं? कभी डर,कभी चिंता,कभी भविष्य की टेंशन,तो कभी अतीत की यादें। मन जैसे एक तूफ़ान बन जाता है। लेकिन अगर मैं आपसे कहूँ किइस तूफ़ान के बीच भीएक ऐसी जगह हैजहाँ पूरी शांति है? आत्मबोध का यह प्रसंगयही जगह दिखाता है। […]