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सचेतन- 37 –आत्मबोध – “निरंतर अभ्यास ही अज्ञान की बीमारी की औषधि है”

क्या आपने कभी महसूस किया है किआप सही बात समझते हैं…फिर भी वही पुरानी बेचैनी,वही प्रतिक्रिया,वही डर लौट आता है? हम कहते हैं—“मैं आत्मा हूँ” “मैं ब्रह्म हूँ” लेकिन ज़रा-सी परिस्थिति बदलते हीहम फिर वही पुराने “मैं” बन जाते हैं। आत्मबोध में आज का विचारयही प्रश्न उठाता है—समझ आ जाने के बाद भी मन अशांत […]

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सचेतन- 03:  आत्मबोध की यात्रा – “कर्म नहीं, ज्ञान ही अज्ञान को मिटाता है”

“हम जीवन भर कुछ न कुछ करते रहते हैं…काम, पूजा, जप, ध्यान, सेवा… लेकिन एक सवाल है—क्या केवल करने से अज्ञान मिट जाता है? शंकराचार्य इस श्लोक मेंइसका बहुत स्पष्ट उत्तर देते हैं।” अविरोधितया कर्म नाविद्यां विनिवर्तयेत्। विद्याविद्यां निहन्त्येव तेजस्तिमिरसंघवत्॥ सरल अर्थ “कर्म—यानी कोई भी क्रिया,अज्ञान को नहीं मिटा सकती,क्योंकि कर्म अज्ञान का विरोधी नहीं […]